मध्यप्रदेश केबिनेट को लेकर शिवराज और सिंधिया में दौड़
मध्यप्रदेश में
मंत्रीमंडल विस्तार के 9 दिन आज होगा विभागों का वितरण
मोहित सिंह कुशवाहा
मध्यप्रदेश सरकार में राजनीतिक
उठापटक लगातार जारी है। जहाँ शिवराज सरकार के 100 दिन पूरे होने पर मंत्रीमंडल का
विस्तार हुआ ही था। लेकिन शिवराज सरकार अभी तक मंत्रीयों को मंत्रालयों का बंटवारा
नहीं कर पाई है। अब बात निकल कर आ रही है कि मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर भी
ज्योतिरादित्य सिंधिया और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान में खींचतान बनी हुई थी। जिसके
बाद से मामला पार्टी हाई कमान के पास चला गया था। दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय
अध्यक्ष जेपी नड्डा, राष्ट्रीय संगठन
महामंत्री बीएल संतोष के साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुलाकात गृहमंत्री
अमित शाह से हुई है। दो दिन तक दिल्ली में चली बैठकों के बाद अब निर्णय ले लिया
गया है। पहले गुरूवार की सुबह मुख्यमंत्री की केबिनेट की मीटिंग में नामों की
घोषणा की बात कही जा रही थी। लेकिन लगातार अटकलें ही लगाई जा रहीं थी।
राज्य की राजनीति की बात करें तो
मध्यप्रदेश की सभी पार्टियों में गुटबाजी कहीं न कहीं देखने को मिल रही है। कांग्रेस
की सरकार से इस्तीफा देने के बाद भाजपा का दामन थामनें वाले विधायकों के साथ
ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामनें भी अब नई चुनौती यह है कि वे पार्टी के अन्दर
कैसे समन्वय बैठा पाते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में एक-एक सीढ़ी सफलता से
चढ़ते जा रहे हैं। लेकिन असल परीक्षा मध्यप्रदेश के विधानसभा उप-चुनाव में देखने
को मिलेगी। आगामी महिनों में 24 विधानसभा सीटों पर होने वाले चुनावों में अधिकतर
सीटें ग्वालियर-चंबल-गुना क्षेत्र की हैं। इन्हीं सीटों पर जीत के बाद से ही भाजपा
में सिंधिया के कद का आंकलन किया जाएगा।
मध्यप्रदेश में वर्तमान में मंत्रीमंडल
विस्तार के बाद 33 में से 11 मंत्री सिंधिया खेमें के हैं। यह पहली बार है कि बाहर
की पार्टी से आए नेताओं को इतनी संख्या में मंत्री बनाया गया हो। मध्यप्रदेश में
कमलनाथ की सरकार गिरा कर भाजपा की सरकार बनाने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया नें
जो प्रतिनिधित्व की माँग की थी, वह उन्हें मंत्रीमंडल के विस्तार में बखूबी मिली
है। कहा जा रहा है कि मंत्रीमंडल विस्तार के समय शिवराज सिंह चौहान की पसंद के कई
पूर्व मंत्रियों को जगह नहीं मिल सकी है। 2018 के विधानसभी चुनाव में हार के बाद
पार्टी हाईकमान उनसे संतुष्ट नहीं है। यह दर्द शिवराज के एक बयान में झलका भी था
जिसमें उन्होंने कहा था कि समुद्र मंथन से अमृत निकला था लेकिन विष का सेवन शिव को
ही करना पड़ा था। यह साफ है कि कई मामलों में शिवराज सिंह की नहीं चल सकी है। भाजपा
अब मध्यप्रदेश में नए लोगों को आगे लाना चाहती है। पार्टी का संकेत है कि जो लोग
कई बार मंत्री रह चुके हैं उन्हें कहीं और मौका दिया जाए लेकिन मंत्री पद पर नए
नेताओं को लाया जाये। ऐसा निर्णय इसलिए लिया गया है कि पार्टी में कोई बड़ा नेता
आने वाले समय में गुटबाजी न कर सके और सभी बराबर से काम करें।
सरकार में मुख्य रूप से विभागों के बंटवारे में नगरीय विकास, राजस्व, पीडब्लूडी, स्वास्थ्य, परिवहन, जल संसाधन, पीएचई, वाणिज्यिक कर,
आबकारी, स्कूल शिक्षा और महिला और बाल विकास जैसे
विभाग शामिल हैं। इन्हीं को लेने की होड़ दोनों खेमों में दिख रही है। ज्योतिरादित्य
सिंधिया नें कुछ ख़ास विभागों की माँगों को केन्द्रिय नेत्रत्व के सामनें रखा है।
उन्होंने अपने 7 केबिनेट मंत्रियों के लिए बड़े विभागों की माँग की थी। साथ में
राज्य मंत्रियों को भी स्वतंत्र विभाग देने की बात कही है। इसके अलावा सूत्रों का
कहना है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वाणिज्यिक कर, आबकारी, महिला बाल विकास, परिवहन, ऊर्जा, उद्योग,
जल
संसाधन, नर्मदा घाटी विकास समेत
कुछ विभाग अपने करीबी मंत्रियों के पास रखना चाहते हैं। केंद्रीय नेतृत्व इस पर
तैयार नहीं हो रहा। पार्टी में कई स्तरों की बातचीत के बाद निर्णय ले लिया गया है।
विभागों के बंटवारे से जुड़ी सूची केन्द्रिय नेत्रत्व नें अपने पास रख ली है।
अंतिम निर्णय अब जेपी नड्डा और बीएल संतोष के हाथों लिया गया है। मध्यप्रदेश में
भाजपा की सरकार बनाने से लेकर मंत्रीमंडल विस्तार और अब विभाग बंटवारे से जुड़े
हुए सभी फैंसले सीधे दिल्ली से लिए गये हैं।
भाजपा नें आगामी विधानसभा उप-चुनाव को ध्यान में देखते हुए मंत्रीमंडल के
विस्तार में ग्वालियर- चंबल संभाग को तरजीह दी गई है। यहाँ से कई विधायकों को
केबिनेट मंत्री और राज्य मंत्री बनाया गया है। पार्टी किसी भी कीमत पर 24 में से
24 सीटें जीतना चाहती है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस भी उप-चुनाव में अपनी ताकत
दिखाने की तैयारी कर रही है। सरकार के शपथ लेने के बाद से कांग्रेस लगातार भाजपा को
घेरनें की कोशिश में लगी हुई है। मंत्रीमंडल विस्तार के समय भी कमलनाथ नें ट्वीट
के माध्यम से तंज कसते हुए कहा था
कि,
“लोकतंत्र के इतिहास में मध्य प्रदेश
का मंत्रिमंडल
ऐसा मंत्रिमंडल है, जिसमें कुल 33 मंत्रियो में से 14 वर्तमान में
विधायक ही नहीं है. यह संवैधानिक व्यवस्थाओं
के साथ बड़ा खिलवाड़ है.
प्रदेश की जनता के साथ मजाक है.”
पिछली कांग्रेस की सरकार
में ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमें से सिर्फ 6 विधायकों को मंत्री पर दिया गया
था। लेकिन भाजपा की सरकार में सिंधिया खेमें के 11 लोगों को मंत्री बनाया गया है।
सरकार के शुरूआत में ही ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक तुलसीराम सिलावट और गोविन्द सिंह राजपूत को
केबिनेट मंत्री बनाया गया था। अभी इनके पास जल संसाधन और खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं
उपभोक्ता संरक्षण सहकारिता मिले हुए हैं। ये दोनों लोग पिछली सरकार में भी मंत्री
थे।
मध्यप्रदेश की राजनीति
में अभी और नये नये किस्से देखना बाकी हैं। आगामी विधानसभा उप-चुनाव में भाजपा में
टिकट को लेकर भी बगावती सुर देखने को मिल सकते हैं। कई सीटों पर 2018 के विधानसभा
चुनाव में सिर्फ कुछ ही वोटों का अंतर था। ऐसी सीटों पर कांग्रेस से आये हुए
नेताओं को टिकट देनें पर असमंजस की स्थिति बन सकती है। लोग पार्टियाँ भी बदल सकते
हैं और निर्दलीय चुनाव में किस्मत आजमा सकते हैं। जो समर्थक पिछले 20 सालों से जिन
नताओं को कोसते आये हैं। अब उन्ही के साथ काम कंधे से कंधा मिला कर राजनीति करना
उनके लिए भी आसान नहीं होगा। समर्थकों के विरोध का भी सामना करना पड़ेगा। इस जोड़-
तोड़ के बाद मिलीजुली सरकार में और क्या क्या खींचतान होंगे ये देखना होगा। पार्टी
संगठन इससे कैसे निपटेगा यह सरकार की सफलता की परिभाषा लिखेगा।



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