"हगिया सोफिया, मस्जिद या फिर चर्च" तुर्की के खिलाफ हुए कई देश
तुर्की की 1500 साल पुरानी इमारत हयाग
सोफिया जो कि एक संग्रहालय के रूप में पहचान रखती थी। अब तुर्की के एक अदालत के
फैसले के बाद से इसे फिर से मस्जिद घोषित किया जा रहा है। तुर्की के एतिहासिक शहर
और राजधानी इस्ताम्बुल में बनी इस ऐतिहासिक इमारत का स्टेटस बदलने को लेकर कई देश
आमने सामने आ चुके हैं। दरसल यह इमारत से जुड़ा हुआ इतिहास 1700 साल पुराना है।
इसके नाम में हयाग का मतलब पवित्र और सोफिया का मतलब विवेक अर्थात ‘इश्वर के
पवित्र विवेक से जुड़ी हुई धार्मिक जगह’ है। यह इमारत निर्माण के समय से 900 साल
तक एक बेहद ही विख्यात चर्च हुआ करती थी। इसके बाद हुए एक युद्द के बाद 500 साल तक
इसे पवित्र मस्जिद के रूप में पहचाना गया। अंत में 1934 में इस झगड़े को सुलझा कर इसे
संग्रहालय का दर्जा दे दिया गया था।
10 जुलाई को अदालत ने 86 साल पुराने इस फैसले
को पलट कर इसे फिर से मस्जिद के रुप में पहचान देने का फैंसला दिया है। अब यह
फैंसला इसलिए भी च्रर्चा में है क्योंकि इस फैंसले को राजनीति से प्रेरित बताया जा
रहा है। क्योंकि तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन और उनकी पार्टी लगातार चुनावों
में इस मुद्दे के नाम पर वोट माँगते आये हैं।
तुर्की के राष्ट्रपति के एलान के बाद विभिन्न ईसाई देशों नें इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस के
साथ ग्रीस नें चेतावनी भी दी है। इसे अब तुर्की बनाम ईसाईयत की तरह से देखा जा रहा
है। साथ ही इसे दुनियाभर में ईसाईयों पर हमला माना जा रहा है।
क्या है हगिया सोफिया का इतिहास
शुरूआत में चर्च बनने का इतिहास
इतिहास के पन्नों को पलटें
तो 1700 साल पहले रोमन साम्राज्य से इसकी कहानी शुरू होती है। रोमन सम्राट
कांस्टेंटिन प्रथम के समय कई देवी देवताओं की प्रार्थना की जाती थी। लेकिन इतिहासकारों
के अनुसार सम्राट के ईसाई धर्म कबूल करने के पश्चात ईसाई धर्म रोमन साम्राज्य का
आधिकारिक धर्म घोषित हो जाता है। इसके बाद 330 ई. में सम्राट की नई राजधानी
कांस्टेंटेनोपोल बसाई जाती है। यहाँ 360 में एक चर्च का निर्माण कराया जाता है। इस
चर्च की छत लकड़ी की बनी होती है। लेकिन 44 साल बाद 404 ई. में इसे जला दिया जाता
है। इसके 11 साल बाद फिर से उस समय के सम्राट थियोडोसियोस इसकी छत को दोबारा
बनवाते हैं। इसके 100 साल बाद भी एक हादसे में यह चर्च फिर से एक युद्ध की वजह से जल
कर खत्म हो जाती है।
सन् 504ई. में सम्राट नियोनोस नया चर्च बनवानें
का काम 532 में दो ऑर्केटेक्ट मिलेटस इज़डिओरोस और ट्रालेस एन्येममिजोस को सौंपते
हैं। सम्राट का आदेश होता है कि एक ऐसी इमारत बनाई जाए जो किसी ने कभी सोची न हो।
लगातार 10 हजार कारीगरों की मेहनत के 5 साल बाद एक भव्य इमारत बनकर तैयार होती है
जिसका नाम हाईया सोफिया रखा जाता है। इसमें उत्तरी अफ्रिका से लाई हुईं ईंटें और
सीरिया से लाया हुआ संगमरमर छत पर लगाया जाता है। इसे बेहिसाब सोना चाँदी और
बेशकीमती पत्थर से सजाया जाता है। यह ईसाई धर्म में एक धार्मिक केन्द्र के रूप में
विख्यात होती है।
कब और कैसे मस्जिद बनी ये बेमिसाल इमारत
इसके 900 साल बाद इस अभेद्य किले को 22 साल का
एक लड़का जीतता है। सुल्तान फतीम हेमेन यहाँ कि गद्दी पर बैठता है। वहाँ के लोगों
के अनुसार वह पैगम्बर मुहम्मद की उस भविष्यवाणी को पूरा करता है जिसमें कहा गया था
कि एक मुस्लिम शासक एक लाल सेब जैसी बेशकीमती चीज को एक दिन जीतेगा। जिसके बाद से
मुस्लिमों में उसका प्रभुत्व बढ़ता है। का शासक होने का दावा करता है। वह राजधानी
कांस्टेन्टीनोपोल का नाम बदल कर इस्ताम्बुल कर देता है। साथ में इस इमारत में भी
कई परिवर्तन करता है। इसकी बनावट में भी कई परिवर्तन करके चारों तरफ 60 मीटर ऊंची
चार मीनारें बनवाता है। इसका नाम भी हयाग सोफिया से हगिया सोफिया कर दिया गया। इस सब के बाद पूरा काल अर्थात 500 वर्ष बीत जाने के बाद ऑटोमन
साम्राज्य का भी पतन होता है।
जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू होता है तो ऑटोमन
साम्राज्य जर्मनी के साथ हो जाता है। युद्ध ख्त्म होने के बाद ऑटोमन सल्तनत का
बंटवारा ब्रिटेन, फ्रांस, ग्रीस और रूस में हो जाता है। इसी के साथ 1922 में
तुर्की में सुल्तान की पदवीं भी ख्तम हो जाती है। 29 अक्टूबर 1923 में ‘रिपब्लिक
ऑफ तुर्की’ पार्टी के नेता मुस्तफा कमाल अतातुर्क राष्ट्रपति बनते हैं। वे तुर्की
को एक सेक्युलर राज्य के रूप में रखना चाहते थे। वे 1934 में हयाग सोफिया की
धार्मिक पहचान खत्म कर देते हैं। इसे एक संग्रहालय के रूप में पहचान दी जाता है।
अब बात करते हैं वर्तमान
हालात की जिसमें वर्तमान राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन अपनी रूढ़ीवादी पार्टी ‘जस्टिस
एंड डेवलपमेंट पार्टी’ से 2002 में तुर्की के प्रधानमंत्री बनते हैं। 11 साल कर
प्रधानमंत्री रहने के बाद 2014 में राष्ट्रपति के पद पर जीत कर आते हैं। देखा जाता
रहा है कि एर्दोगन का झुकाव इस्लाम की तरफ ही रहा है। उनके फैंसलों के कारण उनकी
राजनीति भी इसी विचार से संचालित होती हुई लगती है। वे अपनी रैलियों में कई बार
हयाग सोफिया संग्रहालय को मस्जित बनाने की बात कहते हैं और वोट बटोरते हैं।
विपक्षी उन पर आरोप लगा रहे हैं कि उनका जनाधार खिसक रहा है इसलिए उन्होंने ऐसा
कदम उठया है।
कब हुई इस उथल पुथल की शुरूआत
इन्ही सभी घटनाओं की शुरूआत
29 मई 2020 को हुए एक कार्यक्रम से होती है। जिसमें इतिहास में कांस्टेंटपोल साम्राज्य पर हुई मुस्लिम सेना की
जीत की 567वीं सालगिरह का जश्न मनाया जाता है। इस दिन हयाग सोफिया में 1928 के बाद
पहली बार एक इमाम यहाँ कुरान पढ़ता है। ग्रीस इस घटना के बाद से ही तुर्की पर भड़का
हुआ है। क्योंकि ग्रीस खुद को रोमन साम्राज्य का सांस्कृतिक उत्तराधिकारी मानता
है। इस पर ग्रीस नें तुर्की की सरकार को इस फैंसले के खिलाफ चेतावनी भी दी है।
लेकिन राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन ने साफ कह दिया है कि यह उनके देश का अंदरूनी मामला
है। वे जिस प्रकार के फैंसले लेना चाहेंगे लेंगे।
हयाग सोफिया को यूनेस्को नें वर्ल्ड हेरिटेज
साईट घोषित किया हुआ है। इसलिए यूनेस्को नें भी इस फैंसले के बाद आपत्ति दर्ज कराई
है। उसका कहना है कि इस इमारत में किसी भी प्रकार के बदलाव करने से पहले उसकी
अनुमति लेना बेहद आवश्यक है। वहीं अमेरिका के विदेश मंत्री माईक पोंम्पियो नें कहा
है कि तुर्की अपने धर्म के साथ साथ अन्य धर्मों की भावनाओं का ख्याल रखे। रूस भी
इस मसले पर अमेरिका के साथ है वह भी इस फैंसले के सख्त खिलाफ है।
दरसल यह फैंसला इसाईयों के लिए ख़तरा है। यह
इमारत ईसाईयों की प्रतिष्ठा का एक प्रतीक है। इस प्रकार से आज के समय में हयाग
सोफिया का दोबारा धर्म परिवर्तन करना ईसाईयों कि धार्मिक भावनाएं आहत करना है। अब
देखना ये होगा कि आने वाले समय में ये परिवर्तन तुर्की का दुसरे देशों के साथ
रिश्तों पर क्या प्रभाव डालता है।






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