राजस्थान के मुख्यमंत्री गाँधीवादी नेता अशोक गहलोत राजनीतिक रूप से बहुत हिंसक हैं
राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच
सियासी उठापटक जारी है। मध्यप्रदेश के सत्ता परिवर्तन के बाद सभी की नज़रें लगातार
अब राजस्थान के रेगिस्तान पर जम गईं हैं।
आगे जो भी हो लेकिन फिलहाल इस उठा पटक में गहलोत बाजी मारते दिख रहे हैं।
प्रदेश की राजनीति की बात करें तो 11 दिसंबर 2018 को राजस्थान मध्यप्रदेश और
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के नतीजे आते हैं। राजस्थान में पिछले कई चुनाव हारने
के बाद इस बार कांग्रेस सीमित सीटों के साथ बहुमत तक पहुँचती है। पिछले चार वर्षों
से प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान सम्भाल रहे सचिन पायलट इस जीत के साथ खुद के मुख्यमंत्री
होने का दावा करते हैं। लेकिन दोनों नेताओं में उठापटक सरकार बनने के पहले से जारी
थी। जिसकी शुरूआत टिकट बंटवारे को लेकर ही हो चुकी थी। प्रदेश आध्यक्ष होने के
नाते सचिन समर्थकों को टिकट दिये जाते हैं। जिसके बाद गहलोत समर्थक निर्दलीय चुनाव
लड़ते हैं और जीत भी जाते हैं। कांग्रेस 101, बसपा 6, भाजपा 75 और बाकी
18 विधायक अन्य पार्टियों के साथ निर्दलीय चुनकर आते हैं। यहाँ पर गहलोत स्थानिय
नेता होने के नाते और इन निर्दलीय विधायकों को साथ में लाकर मुख्यमंत्री पद के लिए
दावा करते हैं। गहलोत के राहुल, प्रियंका, सोनिया और अहमद पटेल के साथ अच्छे
रिश्ते रहे हैं। जिसकी वजह से उन्हें
तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाया जाता है।
गहलोत का राजनीतिक जीवन
कांग्रेस परिवार में गिलीबिली के नाम से जाना जाने वाला ये जादूगर असल में
राजनीति का बहुत बड़ा जादूगर दिखाई देता है। गांधीवादी विचारों और सरल भाव दिखने
पर भी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को बखूबी निपटाना जानते है। इस लिस्ट में
राजस्थान के कई बड़े चेहरे हैं। जिनमें मुख्यमंत्री रहे हरिदेव जोशी, शिवचरण
माथुर, परसराम मदेरणा, सीपी जोशी के बाद अब सचिन पाचलट को भी उसी स्थिति में देखा
जा रहा है।
यात्रा शुरू होती है बांग्लादेश के एक शरणार्थी कैंप में जहाँ गहलोत सेवा कर
रहे होते हैं। एक दिन इंदिरा गांधी दौरे पर जाती हैं। गहलोत की लगन देख कर उन्हें
कांग्रेस से जुड़ने की बात कहती हैं। लेकिन तब यह लड़का चुनाव की उम्र से 5 वर्ष
कम का था। तब छात्र राजनीति में गहलोत अपने आप को माँझते हैं। 1973 में संजय गांधी
नए लोगों को संगठन में लाने को लेकर गहलोत को एनएसयूआई का प्रदेश अध्यक्ष बनाते
हैं।
देश में आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार बनती है। राज्य में चुनाव होते
हैं लेकिन कांग्रेस को प्रत्याशी तक नहीं मिलते हैं। ऐसे समय में गहलोत जोधपुर की
सरदारपुरा सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ते हैं और हार जाते हैं। इसके बाद जनता
पार्टी की सरकार टूटती है। देश में फिर से चुनाव होते हैं। 1980 में हुए लोकसभा चुनाव के लिए जोधपुर
से अशोक गहलोत को उतारा जाता है। गहलोत ये चुनाव जीत जाते हैं।
अशोक गहलोत की राजनीतिक कहानी यहीं से शुरू होती है। वे यहाँ अपने सादा
जीवनशैली और पिछड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमी के कारण इंदिरा गांधी की नजर में आते हैं।
1982 के केबिनेट विस्तार में नागरिक उड्डयन मंत्रालय में उप मंत्री बनाया जाता है।
1985 में राजस्थान में उप-चुनाव होते हैं। जिसमें 200 में से 113 सीटें जीतकर
कांग्रेस के हरिदेव जोशी मुख्यमंत्री बनते हैं। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के
बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बनते हैं। वे राज्य में 80 से 85 के बीच हुई नेताओं
की गुटबाजी को रोकने के लिए अशोक गहलोत को दिल्ली से राज्य में प्रदेश आध्यक्ष के
रूप में भेजते हैं। राजीव के स्पष्ट निर्देश होते हैं कि पार्टी में नया नेत्रत्व
खड़ा किया जाए।
इस समय अशोक गहलोत के साथ राजेश
पायलट, बलराम झाखड़ और रामनिवास विर्धा आते हैं। जिसके कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री
हरिदेव जोशी से गहलोत की खींचतान शुरू हो जाती है। इसके बाद 1988 में राजस्थान में
अकाल पड़ता है। इस समय ही राजीव गांधी अलवर में केबिनेट की मीटिंग प्रसतावित करते
हैं। लेकिन निर्देश दिये जाते हैं कि किसी भी प्रकार से कोई भी सरकारी तंत्र का इस
मीटिंग में प्रयोग न किया जाये। यहाँ तक की राजीव गांधी मीटिंग ग्राउड तक खुद
गाड़ी चलाकर लाते हैं। लेकिन रास्ते में खड़ा एक सिपाही मुड़ने का इशारा करता है
और गाड़ी एक मैदान में रुकती है। जहाँ पर सरकारी अमले की गाड़ियां खड़ी होती हैं।
जिस पर राजीव हरिदेव जोशी पर नाराज होते हैं और खाना तक खाने से इंकार कर देते
हैं। कहा जाता है कि उस सिपाही को उस दिशा में राजीव को मोड़ने के लिए गहलोत नें
बोला था। इसके बाद एक महीने में ही कई और कारणों से भी हरिदेव जोशी की मुख्यमंत्री
पद से छुट्टी हो जाती है।
इसके बाद वे जोधपुर सीट से लगातार लोकसभा के सदस्य बने रहे। अशोक गहलोत जमींन
से जुड़े हुए नेता हैं। ओबीसी होने के वाबजूद भी वे सभी वर्गों को साधने का हुनर
रखते हैं। कहा जाता है कि जमीन से जुड़े हुए नेता दिल्ली की दरबारी राजनीति में
अक्सर शिकार बन जाते हैं। लेकिन अशोक गहलोत इसमें से एक अपवाद हैं। वे राज्य की
जमीनीं राजनीति पर भी बखूबी पकड़ रखते हैं और दिल्ली के नेताओं को साधना भी बखूबी
जानते हैं।
1998 के विधानसभा चुनाव के तक वे प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे। जिसके
बाद 1998 में 200 में से 152 सीटें कांग्रेस जीतती है। यह वही समय था कि जब राज्य
में जाट आंदोलन भी जोरों पर था। ऐसे में कांग्रेस के जाट नेता परसराम मदेरणा नेता
प्रतिपक्ष के साथ मुख्यमंत्री के दावेदार थे। लेकिन इस समय तक कांग्रेस की कमान सोनिया
गांधी के हाथ में आ चुकी थी। सोनिया पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ऐसे
नेता को चुना जो जातिगत प्रभुत्व में न हो और आगे गुटबाजी की स्थिति न करें। ऐसे
में मदेरणा जो राज्य की 8% आबादी जाट बिरादरी से आते
थे उनको अलग रखा गया। जबकी गहलोत सामान्य गांधी
विचारों वाले 2% आबादी की माली जाति से आते थे। इस कारण से
मुख्यमंत्री की ताजपोशी अशोक गहलोत के रूप में होती है।
कई राजनीतिज्ञ करते हैं कि अशोक काम तो खूब करता है लेकिन चुनाव नहीं जिता
पाता है। क्योंकि सरकार चलाने को लेकर गहलोत को महारत हांसिल है। पहले कार्यकाल
में भी अकाल के समय लोगों की मद्द का काम ऐसा था कि विपक्ष के लोग भी कोई शिकायत
नहीं कर पा रहे थे। मुफ्त दवा योजना गहलोत सरकार की ऐसी योजना रही जिसकी चर्चा
पूरे विश्व भर में रही थी।
इसी प्रकार से 2003 का विधानसभा चुनाव हार जाने के बाद प्रदेश अध्यक्ष के रूप
में सीपी जोशी को कमान सौंपी गई। सीपी जोशी लगातार चार साल मेहनत करने के बाद 2008
के विधानसभा चुनाव में पार्टी 96 सीटें जीतती है। वहीं सीपी जोशी खुद की उदयपुर से
नागद्वारा सीट एक वोट से हार जाते हैं। सरकार बनाने के लिए उस समय बसपा के 6
विधायकों की जरूरत पड़ने लगी। बसपा के वे विधायक उस समय अशोक गहलोत के साथ थे।
जिसके बाद उन्हें दोबारा प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाता है। सीपी जोशी को फिर
केन्द्र की सरकार में मंत्री बना कर सम्बद्ध कर दिया गया।
ठीक यही बात सचिन पायलट के केस में भी दोहराई गई। चार साल से मेहनत कर रहे
पायलट किसी तरह बहुमत के करीब ही पहुँच पाते हैं। लेकिन निर्दलीय विधायकों और बसपा
के समर्थन से उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया जाता है। अशोक गहलोत शुरूआत से ही
इस प्रकार की स्थिति पर नजर बनाये हुए थे। आज स्थिति यह आ गई कि सचिन पायलट के
सारे दांव उल्टे पड़ गये। अब पायलट को मंत्रीमंडल से भी हटा दिया गया। साथ में
पार्टी से सारी जिम्मेवारियाँ छीन के एक कार्यकर्ता बना दिया गया। सचिन गहलोत के
जादू को बखूबी समझते हैं इसलिए किसी भी प्रकार के समझौते के लिए तैयार नहीं होते
दिख रहे हैं।
अब देखना होगा कि गहलोत अपनी सरकार को जादू से कब तक बचा पाते हैं। क्योंकि
शुरूआत में जो कहा जा रहा था कि सबको साथ में लेकर चलने की कला वे बखूबी जानते हैं।
अब पार्टी में फूट के कारण उनका ये करिश्मा फीका पड़ रहा है। साथ ही सचिन पायलट पर
क्या पलटवार करते हैं ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा लेकिन उन्होंने सचिन
पायलट का डैमेज तो फिलहाल कर ही दिया है। क्योंकि सत्ता का चरित्र ही कभी भी बदलने
का होता है। लेकिन फिलहाल गहलोत मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं। वहीं भाजपा लगातार
इस पर नज़र बनाये हुए हैं। अब बस उसे मौके का इंतेजार है जब सारे पत्ते उसके हिसाब
से होंगे तो सरकार बनाने का दावा ठोका जाए। आगे आने वाले समय में देखना ये दिलचस्प
होगा कि आखिरकार मरुस्थल में कमल खिलेगा या सत्ता की डोर कांग्रेस के हाथ में ही
रहने वाली है।
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